जाने क्यूँ…

कुछ अजीब सा आलम रहता है आजकल,
खुद ही से रूठ जाता हूँ,
खुद ही को फिर मनाता हूँ,
खुद ही को तबाह करके,
खुद को खुद ही से बनाता हूँ।
ना जाने किसका इंतज़ार है,
जाने क्यूँ दिल उदास है,
ना आगे किसी से मिलने की उम्मीद,
ना पीछे किसी के आवाज़ देने की आस है।
जाने क्यूँ चलते चलते कदम रुक जाते हैं,
जाने क्यूँ भूल जाने पर भी लोग याद आते हैं,
जाने क्यूँ जाते हुए कोई हाथ थाम लेता है,
जाने क्यूँ भूला हुआ कोई अकेले में साथ देता है?

मन नहीं करता…

मुझे अब और लिखने का मन नहीं करता,
अपने मन जैसा दिखने का मन नहीं करता।

नफ़ा नुकसान अब बहुत झेल लिया मैंने,
इश्क़ में और बिकने का मन नहीं करता।

इन हार जीत के चक्करों से तंग आ चुका हूँ अब,
इस बाज़ीचा-ए-जीस्त में और टिकने का मन नहीं करता।

मैं नासमझ, नामुराद, मुझे अधपका ही रहने दो,
अब इन साँसों के तवे में सिकने का मन नहीं करता।

उम्मीद है कभी तो किसी लकीर के माने खुलेंगे,
इनका अब मेरी हथेली से मिटने का मन नहीं करता।

मदमस्त…

वो ज़ुल्फ़ें बिखराए बेफिक्री से झूमना तेरा,
वो खुद ही को देख कर खुद ही को चूमना तेरा,
वो रास्तों में गुम हो कर भटकने का डर चेहरे पर,
अगले ही पल फिर दुपट्टा लहराए हरसू घूमना तेरा,
तेरी अदाओं से वाकिफ़ ये हवाएँ, ये दश्त हैं,
तभी तो सब ही तेरे साथ आज मदमस्त हैं।

वो सुंदरी…

मैं रंग रूप का मारा सा,
वो सुंदर सी इक काया सी,
इक नामुराद सी जान हूँ मैं,
वो अरमानों की छाया सी।

मैं घोर मलिन लोभ मोह,
वो कोमल कोई माया सी,
उसकी छवि “रब” का प्रकाश,
मैं “उसकी” मिट्टी ज़ाया सी।

सूरत उसकी मन का सुकूँ,
तस्वीर मेरी पराया सी,
मेरे चरित्र पर कोहरा चढ़ा,
उसकी मूरत नुमाया सी।

ये मरासिम…

ये जो जज़्बातों में बह कर,

राब्ता क़ायम किया था हमने,

इस मरासिम ने तुझको क्या दिया?

कुछ भी नहीं।

इस मरासिम ने मुझको क्या दिया?

कुछ भी नहीं।

पर हाँ, खुदगर्ज़ निकला ये राब्ता,

न तुझसे न मुझसे वफ़ा निभाई,

तुझसे तेरा सुकून ले गया,

मुझसे मेरी ज़िंदगी।

रूह का लिबास बदल लें…

ये रूह मेरी हर पल,
कहती है चल,
अब लिबास बदल लें,
कुछ एहसास बदल लें,
बदल लें लफ़्ज़ों के माने,
दूर और पास बदल लें।

और खुश रहने की वजहें,
किसी और की मुस्कान थी जो,
अब बेवजह ही मुस्कुराएं,
वो सूरत-ए-उदास बदल लें।

मौके कई दे दिए अब तलक,
यक़ीन का इम्तेहान भी बहुत हुआ,
इस बार खुद और ख़ुदा पर,
कुछ थोड़ा विश्वास बदल लें।

खुद ही का हमसफर अब,
खुद ही को बनाया जाए,
वो ख्वाइशों में कहीं दबा हुआ,
अगर और काश बदल लें।

मैं और तू के तर्क से दूर,
उस शजर की छावों में बैठें,
कुछ देर दम लेकर फिर,
कुछ ज़मीं, कुछ आकाश बदल लें।

इंतज़ाम सब है…

महफिलों से भरी गलियों में रहता हूँ,
जाम, इश्क़, यार, सर-ए-आम सब है।

तू बस एक बार आने की हामी तो भर,
मेरी जान, यहाँ इंतज़ाम सब है।

कोई यहाँ तुझे पहचान भी जाए तो डर नहीं,
मेहमान-ओ-मेज़बान-ओ-मकान, यहाँ बदनाम सब है।

तेरा मज़हब, मेरा खुदा, किसी का ज़िक्र नहीं,
यहाँ के काफिरों में ये हराम सब है।

तन्हाई का नाम-ओ-निशाँ नहीं यहाँ,
दिल-फेक आशिक़ मेहरबान सब है।