ए वक़्त, रुक जा…

ऐ वक़्त, रुक ही जा तू यहाँ,
उसे जाने न दे जहाँ,
न पहुँचेगी मेरी बात कभी,
न आएगी उसे फिर याद कभी।

क्या पता फिर कभी मुलाक़ात न हो,
क्या पता फिर कभी ये रात न हो,
क्या पता उसके कोई नज़दीक आए,
कौन जाने फिर वो कभी वापिस न आए।

मेरी खामियाँ गर किसी की खासियत हो,
हँसा दे बस यूं ही, ऐसी शख्सियत हो,
मुझसे फिर मेरी मोहब्बत का भी हिसाब मांगा जाएगा,
क्या ही पता कि मुझसे बात करना भी टाला जाएगा।

वाकिफ हूँ, उसके हर पल में मैं शामिल नहीं,
तो क्या हुआ गर उसके बगैर मैं कामिल नहीं,
उसने तो साथ निभाने का कोई वादा नहीं किया,
मैं ही रहूँ काबिज़ दिल में, इरादा नहीं किया।

मैं नहीं मानता इश्क़ के इन पुराने रिवाज़ों को,
“जाने देना ही मोहब्बत है”, ऐसे ज़िक्र-ओ-किताबों को,
मुझे तो फकत उससे ही मतलब है,
साथ रहे हमेशा, बस यही ज़रूरत है।

मेरा दिल हमेशा उसके नाम पे खुदगर्ज़ रहेगा,
चाहे कुछ हो, बस यही एक चीज़ कहेगा,
कि ए वक़्त, होगा एहसान तेरा जो तू यहीं रुक जाएगा,
कल क्योंकि मुझे पता है, मेरा यार चला जाएगा।

तू अनजान सही…

मेरे हर्फ़, मेरा इश्क़ तेरा गुमान ही सही,

हक़दार हूँ तेरे ख़याल का, तेरा मेहमान ही सही।

ना हो मेरे नसीब में तेरी मौजूदगी, ना सही,

तेरे नाम की उम्र ना मिले, तेरे ज़िक्र की शाम ही सही।

तेरा ग़ुरूर तुझे मुबारक, मेरी आशिक़ी मुझे,

मुझे रुसवा करने की रीत, तेरी शान ही सही।

देखूँ मैं भी कब तक नज़रंदाजी का ये खेल रहेगा,

तेरी गलियों में मैं तुझसे अनजान ही सही।

छू ले तू लबों से, या बस नज़र कर दे,

ख़ुमार तो तब भी होगा, ख़ाली ये जाम ही सही।

खुदा है तू, तुझसे कैसा पर्दा,

सर आँखो पर तेरी चाहत, मेरी जान ही सही।

ख़ुशी के आँसू या ग़म की मुस्कान,

वाक़िफ़ हूँ तेरे हर एहसास से,

तुझसे चाहे मेरी फ़क़त पहचान ही सही।

वफ़ा निभा…

ए दिल किसी से तो वफ़ा निभा,

या तो मेरे साथ तन्हा रहना सीख

या उसी के साथ चला जा।

उसे लगता है सुकून मिला मुझे उससे दूर रहकर,

कभी तो उसे भी मेरी गली ला, मेरा हाल दिखा।

शिकायत रहती है उसे अक्सर कि कहता नहीं मैं,

कभी अकेले में उसे भी मेरी सदा सुना।

क्यूँ भला मैं इस क़दर अकेला ही तड़पूँ,

कभी तो उसको भी रातों में तड़पा।

वो भी चखे इस दर्द का ज़ायक़ा,

कभी उसे भी तो रात भर जगा।

हो ऐतबार किसी पे, रहे इंतज़ार किसी का,

हर पल बेचैनी का उसे ये रोग तो लगा।

नज़रन्दाज़ कर जाना आदत है उसकी,

जान कर अनजान बनने का कुछ हुनर मुझे भी सिखा।

चलो माना वो मुझसे अनजान-ओ-ग़ैर सही

बेख़ुदी का ये फ़ितूर फिर मेरे भी ज़ेहन से हटा।

ए दिल किसी से तो वफ़ा निभा।

एक रिश्ता…

बेजान सी आँखों से

वो देखता रहा मुझे

कुछ आधे अधूरे लफ़्ज़

कुछ उलझे से ख़याल भी थे

कोशिशें कई की उठने की

खड़ा हुआ, लड़खड़ाया

फिर से गिर गया

एक आस थी किसी के साथ की

शायद थामे, उस हाथ की

पर दुनिया की इस भाग दौड़ में

अनदेखा ही होता रहा

बेजान सी आँखो से

वो देखता रहा मुझे

आख़िर सांसें लेता, वो एक रिश्ता..

रईसी…

रईसी थी अलग, अलग उसकी जागीर थी,

एक था बिस्तर साथ में, एक बच्ची की तस्वीर थी।

बातें करता कभी, धूल हटाता तस्वीर से,

क्या ही शिकायत करता भला वो अपनी तक़दीर से।

सुना है हर शाम वो बातें भी दो चार करता है,

जहाँ क़ब्र है बच्ची की, बैठा कई देर वहाँ रहता है।

कहता है अब भी अक्सर वो उससे मिलने आती है,

इस दुनिया की शिकायतें अब उस जहान में लगाती है।

कहती है उस जहान में बाबा अब कोई डर नहीं,

बस कमी है तो ये कि वहाँ भी अपना कोई घर नहीं।

पूछती है अक्सर कि क्यूँ ऐसा दस्तूर है,

क्यूँ कोई कमज़ोर, कोई इतना मजबूर है।

क्यूँ कोई इस बरसात से ख़ुश होता है,

ऐसा क्यूँ है कि चूती छत देख कोई रोता है।

कहती है कि काश मैं मासी के घर ही रही होती,

काश के वो छत ना मुझपे ढही होती।

तो शायद आज सुकून से सोयी मैं होती,

बाबा तेरे बग़ल में मेरी तस्वीर नहीं, मैं होती।

उसके लिए लिखता हूँ…

तेरी एक आह के लिए लिखता हूँ,

यक़ीं कर, बस तेरी वाह के लिए लिखता हूँ।

छोड़ देता ये शायरी, ये आशिक़ी बहुत पहले,

मैं तो बस तेरी चाह के लिए लिखता हूँ।

कौन चाहता हैं इस गुमशुदगी में रहना,

तुझसे मिले जो, उस राह के लिए लिखता हूँ।

छोड़ दी होती मैंने ये दुनिया कबकि,

मेरी जान के सदके, तेरी परवाह के लिए लिखता हूँ।

माँगना मेरी फ़ितरत में तो नहीं,

पर जब लिखता हूँ, तेरी पनाह के लिए लिखता हूँ।

भुला दे तू मुझे, मेरी हस्ती मिटा दे,

फिर भी मैं तेरी चाह के लिए लिखता हूँ।

बेमतलब, बेमाइने हैं जिसके सामने सब,

उस संग दिल, बेपरवाह के लिए लिखता हूँ।

वो निशान आज भी हैं…

मेरी आँखों में तेरे नूर के निशान आज भी हैं,

होंठों पे मेरे तेरी मुस्कान के निशान आज भी हैं।

की थी जो बातें मुझसे उन हसीन शामों में,

कानों में उन बातों के निशान आज भी हैं।

हँसते हुए मेरे काँधे पे जो छुपाया था चेहरा,

क़मीज़ पर तेरे काजल के निशान आज भी हैं।

खो गयी थी मेरी बाहों में अकेले में जब,

तेरे लबों की लाली के वो निशान आज भी हैं।

लड़खड़ा के पकड़ी थी जो मेरी बाँह तूने,

तेरे नाख़ून के मेरी बाज़ू पे निशान आज भी हैं।

जो पल वो बिताए थे साथ हमने कभी,

हर पल में उन पलों के निशान आज भी हैं।

कुछ यादें…

यादें दिल में

कुछ दर्द भरी, कुछ सुहानी भी हैं

ना मानो तो कुछ भी नहीं

मानो तो इक कहानी भी हैं

लब ख़ामोश रखने हैं और

बातें सुनानी भी हैं

किसी के लिए बस बात

किसी के लिए जिंदगानी भी हैं

यूँ तो हर कोई वाक़िफ़ है इनसे

पर हर किसी से अनजानी भी हैं

कुछ बातें हैं दिल में, आज तुमसे

कहनी भी हैं, छुपानी भी हैं।

आ कुछ देर बातें करें…

आ कुछ देर बैठ कर बातें करें,

कुछ बेचैन कुछ सुकून वाली रातें करें,

जहाँ हों तेरी पनाहों में मेरी बसर,

कुछ ऐसे मुलाक़ातें करें।

कुछ अपनी तू सुना,

कुछ मैं अपनी बयान करूँ,

कुछ बातें हो दुनिया जहाँ की,

ऐसी भी कुछ बहारें करें,

आ कुछ देर बैठ कर बातें करें।

कैसे कटे दिन तेरे,

कैसे तेरे बिन रातें मेरी,

उन दिन-माह-ओ-साल,

की साझा शामें करें,

आ कुछ देर बैठ कर बातें करें।

वो बेमतलब का रूठ जाना तेरा,

और तुझे हँसाने की मेरी कोशिशें,

फिर बाहों में खो जाना,

याद आज वो यादें करें,

आ कुछ देर बैठ कर बातें करें।

कल फिर तु चली जाएगी,

फिर ना जाने कब आएगी,

भीगी रहें पलकें अगली मुलाक़ात तक,

प्यार की कुछ ऐसी बरसातें करें,

आ कुछ देर बैठ कर बातें करें।

इंतज़ाम कर…

इतना तो मुझ पर एहसान कर,

अपनी कोई महफ़िल मेरे नाम कर,

मेहरबानी तेरी नहीं, माना मेरे लिए,

मेरी बर्बादी का सही, पर इंतज़ाम कर।

अब नहीं उम्मीद इस शहर से कुछ,

कुछ मज़ाक़ बना, कुछ बदनाम कर,

जो लिखे थे ख़त निचोड़ के कलेजे को,

छोड़ तकल्लुफ़, अब सारे ख़त आम कर।

ख़बर तो पहुँच ही जाएगी तुझ तक,

मेरी मौत पे एक जश्न-ए-शाम कर,

क्यूँ ख़ुश्क रहे मेरे क़ब्र की मिट्टी,

मेरे नाम अपने हाथ से बादा-ओ-जाम कर।

ना मिली तू, खोया तूने मुझे भी,

इस दर्द को अपने अब तो बयान कर,

कल शायद ना रहूँ मैं तेरे सजदे में,

आज ही तू मुझको आख़िरी दुआ-सलाम कर।

भीड़…

कैसी अजीब मुझे हर चीज़ दिख रही है,

मैं नहीं, भीड़ में अकेले रहने की टीस ये कह रही है।

कैसी ये दुकान लगी है जज़्बातों की,

ख़रीदने को कुछ नहीं, फिर भी हर चीज़ बिक रही है।

तिलमिला रहा है भूख से हर शक्स यहाँ,

ठंडे तवे में ना जाने कौन रोटी सिक रही है।

भूल गया हर रिश्ता आदम आपस के,

जानवरों से उसकी दोस्ती ख़ूब दिख रही है।

कैसी अजीब मुझे हर चीज़ दिख रही है,

मैं नहीं, भीड़ में अकेले रहने की टीस ये कह रही है।

तो क्या हुआ…

तो क्या हुआ जो तू साथ नहीं

तेरे मेरे बीच अब वो बात नहीं

तेरी दीद तू मुझसे छुपा नहीं सकती

मुझे पता है

जुदा होकर भी मुझसे दूर तू जा नहीं सकती..

तो क्या हुआ जो तू नाराज़ है

तेरे मिलने की शायद ही अब कोई आस है

पर वो पल तू भुला नहीं सकती

जो अरमान जागे थे

तेरे मेरे, वो तू अब सुला नहीं सकती..

तो क्या हुआ जो तेरे साथ कोई और है

किसी और का हक़, किसी और का ज़ोर है

मैं भी कभी तेरा ही हिस्सा था

जो तू झुठला नहीं सकती

अपनी ज़ुल्फ़ों से मेरी महक मिटा नहीं सकती..

तो क्या हुआ जो तेरे हाथों में किसी और का हाथ है

तेरे साथ मुझसे बेहतर साथ है

ज़माना वो भी था

जब मैंने भी तुझको छुआ था

हाथों के ज़रिए दिल में कुछ हुआ था..

तो क्या हुआ जो तू अब साथ नहीं

वो बात, मुलाक़ात नहीं

पर अब भी मेरे दिल-ओ-दिमाग़ में तू छाई है

अब भी हर शाम-ओ-सहर तू याद आई है

अब भी तेरे खतों में लिखी बात रुला देती है

एक आहट भी तेरी याद दिला देती है

अब भी मेरे दिल में तेरी वही जगह है

अब भी मेरे जीने की एक तू ही वजह है

अब भी मुझे तेरे आने का इंतज़ार है

हाँ, ये सच है, अब भी मुझे तुझसे प्यार है…

बेनूर सी आँखें…

बेनूर सी आँखें ताकती हैं जो दूर से

पुकारती हैं मुझे दहलीज़ पे अपनी

एक बार नज़दीक से देखने के लिए

सहलाने के लिए मेरे बाल, मेरे हाथ, मेरा चेहरा

एक हल्की सी आहत को तरसती हैं

एक ज़रा सी चाहत को तरसती हैं

रहती हैं इंतज़ार में मेरे

कभी तराशती थी मेरी आँखें जिसकी तस्वीर

अब ढूँढती हैं उसे ही, उससे दूर कही

आवाज अब भी देते होंगे मुझे

पर आवाज़ कोई रोकती नहीं रास्ता मेरा

नज़रों से दूर, दिल से उतर जाने का उसूल

शायद अब हक़ीक़त बन गया है मेरा

बेनूर सी आँखें ताकती हैं जो दूर से

पुकारती हैं मुझे दहलीज़ पे अपनी मज़ार की।

तेरे आने के बाद…

कौन तुझसे दूर रह पाएगा,

महफ़िल में तेरे आने के बाद,

ये जहाँ भी रोशन हो जाएगा,

तेरे बेपरदा हो जाने के बाद।

काफ़िर ना बने, मुमकिन ही नहीं,

कोई तेरे बहलाने के बाद,

सुकून मिले तह-ए-दिल तक,

एक तेरे सहलाने के बाद।

तू भी अजब हरजाइ निकला,

तुझे मोहब्बत हुईभी मेरे जाने के बाद,

जश्न का मौसम बन गया है,

तेरा मेरी क़ब्र पर आने के बाद।

किताब-ए-इश्क़…

इक किताब में मैंने तेरे फ़साने लिखे हुए हैं,

वादा खिलाफ़ी के तेरे बहाने लिखे हुए हैं,

बारिशों में तेरी पहलकदमी के तराने लिखे हुए हैं,

मेरे लफ़्ज़ों में तेरी दीद के पैमाने लिखे हुए हैं।

रुसवा हुए कहाँ, कहाँ कितने थे दीवाने लिखे हुए हैं,

शहर में तेरे बदनाम वो अफ़साने लिखे हुए हैं,

निगाहों में तेरी जो हैं वो मैखाने लिखे हुए हैं,

जा याद करेगी दुनिया,

किसी ने तेरे इश्क़ में ज़माने लिखे हुए हैं।

देखें क्या करते हैं…

हँसते हैं रोते हैं या फिर से नज़रअंदाज करते हैं,

मेरी मौत की ख़बर पे देखे वो क्या करते हैं।

भिजवाया था पैग़ाम उनको जल्द आने का,

देखें ना आने का अब बहाना क्या करते हैं।

याद तो आएँगी बातें मेरी हर रोज़ उन्हें,

भूलने को मुझे, जतन क्या क्या करते हैं।

यक़ीं है मुझे मेरी क़ब्र पे वो आएँगे ज़रूर,

देखे ज़रा हम भी, क़बूल क्या करते हैं।

हम तो हो गए याद, याद कौन रखेगा,

नए दीवानों का खुदा जाने वो हश्र क्या करते हैं।

मुनासिब ना होगा उनके सामने मेरा नाम आना,

वो ही जाने तरकीब, मुझे अनजान क्या करते हैं।

ऐ साक़ी मेरे नाम का जाम अभी ना रख,

हाथ में आए तो, देखूँ मेरें जाम का क्या करते हैं।

याद करोगे ना?

कल जब मैं नहीं रहूँगा आस पास

ना हो सकेगी चाह कर भी अपनी बात

जब दुशवार हो जाएगी मुलाक़ात

तुम मुझे याद करोगे ना?

जब मेरी आवाज़ तुम तक ना पहुँच पाएगी

तुम्हारी सदा भी जब अधूरी रह जाएगी

तब भी तुम मुझसे बात करोगे ना?

तुम मुझे याद करोगे ना?

जब मेरे लफ़्ज़ जम गए होंगे

मेरे क़दम आधे में ठहर गए होंगे

तुम मुझसे तब भी सवालात करोगे ना?

तुम मुझे याद करोगे ना?

जब मेरे शेर पुराने पन्नो में दब जाएँगे

मेरे लिखे हर्फ़ जब तुम्हें नज़र आएँगे

बीते पलों को फिर जीने की फ़रियाद करोगे ना?

तुम मुझे याद करोगे ना?

ख़ैर गर ना भी याद करो तो कोई बात नहीं

गुज़र जाए मेरे बिना रात तो कोई बात नहीं

अनजाने में ही कुछ अश्क़ अपने मेरे नाम करोगे ना?

तुम मुझे याद करोगे ना?

क्या तुम मेरी तस्वीर को रखोगे अपने पास

क्या तुम पर तब भी रहेगा मेरा एहसास

मुझसे ख़्वाबों में मुलाक़ात करोगे ना?

तुम मुझे याद करोगे ना?

तब तो ना मिलने का बहाना ना रहेगा

सितम ढाने का माहोल रोज़ाना ना रहेगा

तुम तब भी मेरा इंतज़ार करोगे ना?

तुम मुझे याद करोगे ना?

ता उम्र तो इंतज़ार मुमकिन नहीं

ना मिले तुम्हें प्यार मुमकिन नहीं

पर मेरे हिस्से का मुकम्मल मुझे प्यार करोगे ना?

बोलो ना, तुम मुझे याद करोगे ना?

तुम और मैं..

जब सब ख़त्म हो जाएगा

और सिर्फ़ एक ख़ामोशी रहेगी

जब ज़हन में तुम्हारा नाम

और उससे जुड़ी मदहोशी रहेगी

जब होगा मुझे कुछ होश

और थोड़ी कुछ बेहोशी रहेगी

तुम्हारा इक ज़िक्र, मुझे यक़ीं है

फिर वो शाम लाएगा

जहाँ सिर्फ़ तुम रहो, मैं रहूँ

और रहे हमारा साथ

जहाँ ना हों लफ़्ज़

ना शिकवे, ना शिकायतें

ना उम्मीद, ना फ़रियाद

ना वजह, ना खुदी

बस इशारों में हो बात

जहाँ ना तुम समझो मुझे, ना मैं समझू तुम्हें

पर जब आँसु बहें मेरे, दर्द तुम्हें भी हो

जब काँटा चुभे तुम्हें, सिसक मेरी भी हो

जब ये जज़्बात इन अल्फ़ाज़ों से परे हो

ना कोई बंदिश, ना ही कोई क़ैद

बस इक मैं रहूँ, इक तुम रहो

और हमारी एक टुक

एक दूजे को तकती आँखे।