खूबसूरत…

कुछ परेशानियाँ छुपाए हुए,

कुछ दर्द दिल में दबाए हुए,

वो मुस्कान होंठों में सजाए,

तुम जब भी सामने आते हो,

दिल के तार छू जाते हो।

बहुत मज़बूत हो तुम।

हाँ, जानता हूँ मैं कि,

कहना आसान है,

और जीना मुश्किल,

हर वो पल जो तुम जीते हो।

शायद इसलिए तुम,

ज़्यादा खूबसूरत हो,

हर उस शक्स से जिसने,

लड़ने की जगह,

चुप रहना,

दबे रहना,

ज़्यादा बेहतर समझा।

बेनाम ख़त…

फ़र्ज़ करो कि मैं तुम्हें एक ख़त लिखूँ,

बेनाम ख़त,

जिसमें कुछ ना हो मेरे बारे में,

क्या तुम पहचान लोगे?

मेरी लिखावट ना सही,

मेरी बयानी?

क्या उसे पहचान पाओगे?

चलो वो भी जाने दो,

क्या उन ज़िक्रों को जान जाओगे,

जिन पर हम ठहाके लगा के हँसे थे,

वो सवाल जिनको सुनकर तुमने,

मुझे पागल कहा था।

वो नाम जो मैं तुम्हें दिया करता था,

और तुम खीझ कर जवाब देते थे सुन कर,

और फिर मुस्कुराते थे।

हाँ, काफ़ी अरसा हो गया है इन सबको,

पर मुझे यक़ीन है,

ये सब यादों का एक गुच्छा बन कर,

तुम्हारे ज़हन में कहीं क़ाबिज़ होगा,

और मेरा ख़त मिलते ही,

तुम उस पुराने संदूक को खोलोगे,

जिसमें हमारी पुरानी,

रंग उड़ी हुई,

बदहवास सी यादों की,

पोटली रखी होगी तुमने।

मुझे यक़ीन है तुम खोलोगे उस संदूक को,

इसी यक़ीन के यक़ीन पर,

मैं तुम्हें ख़त लिखूँगा,

ज़रूर लिखूँगा,

और फिर वो ख़त,

उसी संदूक का हिस्सा बन जाएगा।

ये पेड़…

कभी तूफ़ाँ में झूलते हुए पेड़,

कभी गर्मी में सूखते हुए पेड़,

हवाओं का ये मधुर संगीत,

और उस पर झूमते हुए पेड़।

कभी बाद बरसात बरसते,

और कभी मंद मंद महकते,

कभी ख़ुदगर्ज़ी से बेहद आहत,

आदम ज़ात से रूठते हुए पेड़।

साथी हैं मेरी ग़ज़लों के,

मेरी नज़्मों की फसलों के,

कभी मेरे आंसुओं से भीगे,

साथ कभी टूटते हुए पेड़।

चश्मदीद मेरे बचपन के,

यार थे ये मेरे यौवन के,

उम्र-ए-दराज़ हैं अब तो,

दिन-ब-दिन भूलते हुए पेड़।

सीख सरल मिलती है हर पल,

समझ सके तो समझ ले पागल,

जड़ें ज़मीन से जोड़ के गहरी,

आसमानों को चूमते हुए पेड़।

जाने क्यूँ…

कुछ अजीब सा आलम रहता है आजकल,
खुद ही से रूठ जाता हूँ,
खुद ही को फिर मनाता हूँ,
खुद ही को तबाह करके,
खुद को खुद ही से बनाता हूँ।
ना जाने किसका इंतज़ार है,
जाने क्यूँ दिल उदास है,
ना आगे किसी से मिलने की उम्मीद,
ना पीछे किसी के आवाज़ देने की आस है।
जाने क्यूँ चलते चलते कदम रुक जाते हैं,
जाने क्यूँ भूल जाने पर भी लोग याद आते हैं,
जाने क्यूँ जाते हुए कोई हाथ थाम लेता है,
जाने क्यूँ भूला हुआ कोई अकेले में साथ देता है?

मन नहीं करता…

मुझे अब और लिखने का मन नहीं करता,
अपने मन जैसा दिखने का मन नहीं करता।

नफ़ा नुकसान अब बहुत झेल लिया मैंने,
इश्क़ में और बिकने का मन नहीं करता।

इन हार जीत के चक्करों से तंग आ चुका हूँ अब,
इस बाज़ीचा-ए-जीस्त में और टिकने का मन नहीं करता।

मैं नासमझ, नामुराद, मुझे अधपका ही रहने दो,
अब इन साँसों के तवे में सिकने का मन नहीं करता।

उम्मीद है कभी तो किसी लकीर के माने खुलेंगे,
इनका अब मेरी हथेली से मिटने का मन नहीं करता।

मदमस्त…

वो ज़ुल्फ़ें बिखराए बेफिक्री से झूमना तेरा,
वो खुद ही को देख कर खुद ही को चूमना तेरा,
वो रास्तों में गुम हो कर भटकने का डर चेहरे पर,
अगले ही पल फिर दुपट्टा लहराए हरसू घूमना तेरा,
तेरी अदाओं से वाकिफ़ ये हवाएँ, ये दश्त हैं,
तभी तो सब ही तेरे साथ आज मदमस्त हैं।

वो सुंदरी…

मैं रंग रूप का मारा सा,
वो सुंदर सी इक काया सी,
इक नामुराद सी जान हूँ मैं,
वो अरमानों की छाया सी।

मैं घोर मलिन लोभ मोह,
वो कोमल कोई माया सी,
उसकी छवि “रब” का प्रकाश,
मैं “उसकी” मिट्टी ज़ाया सी।

सूरत उसकी मन का सुकूँ,
तस्वीर मेरी पराया सी,
मेरे चरित्र पर कोहरा चढ़ा,
उसकी मूरत नुमाया सी।

ये मरासिम…

ये जो जज़्बातों में बह कर,

राब्ता क़ायम किया था हमने,

इस मरासिम ने तुझको क्या दिया?

कुछ भी नहीं।

इस मरासिम ने मुझको क्या दिया?

कुछ भी नहीं।

पर हाँ, खुदगर्ज़ निकला ये राब्ता,

न तुझसे न मुझसे वफ़ा निभाई,

तुझसे तेरा सुकून ले गया,

मुझसे मेरी ज़िंदगी।

रूह का लिबास बदल लें…

ये रूह मेरी हर पल,
कहती है चल,
अब लिबास बदल लें,
कुछ एहसास बदल लें,
बदल लें लफ़्ज़ों के माने,
दूर और पास बदल लें।

और खुश रहने की वजहें,
किसी और की मुस्कान थी जो,
अब बेवजह ही मुस्कुराएं,
वो सूरत-ए-उदास बदल लें।

मौके कई दे दिए अब तलक,
यक़ीन का इम्तेहान भी बहुत हुआ,
इस बार खुद और ख़ुदा पर,
कुछ थोड़ा विश्वास बदल लें।

खुद ही का हमसफर अब,
खुद ही को बनाया जाए,
वो ख्वाइशों में कहीं दबा हुआ,
अगर और काश बदल लें।

मैं और तू के तर्क से दूर,
उस शजर की छावों में बैठें,
कुछ देर दम लेकर फिर,
कुछ ज़मीं, कुछ आकाश बदल लें।

इंतज़ाम सब है…

महफिलों से भरी गलियों में रहता हूँ,
जाम, इश्क़, यार, सर-ए-आम सब है।

तू बस एक बार आने की हामी तो भर,
मेरी जान, यहाँ इंतज़ाम सब है।

कोई यहाँ तुझे पहचान भी जाए तो डर नहीं,
मेहमान-ओ-मेज़बान-ओ-मकान, यहाँ बदनाम सब है।

तेरा मज़हब, मेरा खुदा, किसी का ज़िक्र नहीं,
यहाँ के काफिरों में ये हराम सब है।

तन्हाई का नाम-ओ-निशाँ नहीं यहाँ,
दिल-फेक आशिक़ मेहरबान सब है।

वो पल…

तेरी तस्वीर आज जब मेरे रूबरू हुई,
इक पल को वो बात याद आई,
जो तब तुझसे कहना रह गया,
न पलकें झपकाई, न होंठ हिले,
इक आखरी अक्स तेरा था जो आंखों में,
वो भी इस कतरे आँसू के साथ बह गया।

मैं तकता रहा तेरा चेहरा,
वो तेरे बाल, तेरे रुखसार,
और तेरी आँखों से छलकता प्यार,
मैंने बस वक़्त गँवा दिया लफ्ज़ चुनने में,
तू आया, मुस्कुराया, हाथ पकड़ा,
और अलग होने का अपना फरमान कह गया।

सब तो ख्वाब सा ही लगा उस पल,
इश्क़ कहाँ, बचपना था, शरारत थी,
फिर भी तेरे बिना ज़िन्दगी आफत थी,
मैं काफी देर तक उसी जगह खड़ा रहा,
तूने मुड़ के देखा नहीं पर,
वो कच्चा पक्का सा रेत का महल तेरे जाते ही ढह गया।

आज इतने सालों बाद जब फिर तुझे देखा,
दिल फिर उसी जगह जा के गिर पड़ा,
जहाँ उस रोज़ मैं था खड़ा,
तब लफ्ज़ नहीं थे तो तुझे रोक न पाया,
आज लफ्ज़ हैं, बेशुमार हैं, पर तू नहीं,
दिल मेरा तब भी चुप था, अब भी सब सह गया।

तू मोहताज नहीं…

तू किसी तारीफ की मोहताज नहीं,
तू मल्लिका है,
भले तेरे सिर पे ताज नहीं।

तेरा जमाल छिपा रहे दुनिया से,
ऐसा कोई पर्दा, कोई रिवाज नहीं।

तेरे हुस्न से टक्कर हो बराबर की,
यहाँ हसीन ऐसा कोई आज नहीं।

यहाँ से वहाँ तक कि कतार में देख ले,
कौन सा ऐसा दिल है जिसमें तेरा राज नहीं।

जो बात रखनी है खुल के बोल,
मेरे दिल की मेज़ पर दराज नहीं।

इज़हार-ए-इश्क़…

इतनी लंबी ग़ज़लें लिख डाली,
ये पन्ने भर भर के नज़्में,
ये शेरों के पुलिंदे लगे हुए,
बस इतना ही तो कहना था कि चाहते हो मुझे।
घर को जाते हुए उस सुनसान रास्ते पर,
चलते हुए मेरा हाथ छू लेते,
काफी होता उतना ही मेरे समझने के लिए।
या फिर मुझे गले लगा लेते,
जब उस शाम बारिश के दौरान,
बिजली कड़की थी, और सहम गई थी मैं।
या फिर बस सामने आ कर,
इज़हार कर देते अपनी मोहब्बत का,
जवाब तो सवाल से पहले ही,
तुमने मेरी आँखों मे पढ़ लिया था न।

एहसान फरामोश…

मैंने चुन चुन के उन्हीं का नाम उछाला है,
जिनके कपड़े सफेद और दिल काला है।

तुम कहते हो आएगी सहर इक रोज़ ज़रूर,
मुझे भी ज़रा दिखाओ किधर को उजाला है।

एक पल अर्श पर, अगले ही पल फर्श पर,
इस जग का रवैया ही निराला है।

इस अहल-ए-जहाँ से क्या उम्मीद रखूँ ईमानदारी की,
जिसने मीरा की भक्ति में भी खोट निकाला है।

बात निकाल दूँ अभी गर मैं, बिखर जाएंगे कई,
न जाने कितनों की दुनिया को लफ़्ज़ों में अपने सम्हाला है।

तुम सामने न आ जाना, पहचान लूंगा तुम्हे,
तुम क्या जानो, ये मंज़र किस कदर अब तक टाला है।

लड़खड़ाऊंगा मैं तो सम्हालेंगे कई हाथ मुझे,
क्या खूब अब तक ज़हन में गलतफहमी को मैंने पाला है।

और तो किसी से उम्मीद न थी मुझे तेरे सिवा, ए ख़ुदा,
अब छोड़, कहने को न बचा तुझसे भी अब कोई नाला है।

उस तक पहुँचे…

कोई तो दास्तान इन्तेहाँ तक पहुँचे,
तेरे बिन कौन जाने कौन कहाँ तक पहुँचे।

मैं बुलाता हूँ तुझे मिलने यहाँ मुसलसल,
ये तमन्ना मुकम्मल जाने किस जहान तक पहुँचे।

दर्द, इश्क़, आंसू, मुस्कान, बहुत कुछ है,
फरियादी कोई लेकिन पहले दुकान तक पहुँचे।

मेरे हँसने की आवाज़ें सुनाई देती हैं तुझे अक्सर,
कभी ये सदा भी तुझ मेहरबान तक पहुँचे।

सुबह ही करवा दी थी खबर उसे जनाज़े की,
शायद ही वो घर पर शाम तक पहुँचे।

पहुँच से दूर बहुत है मेरी वो अब,
कम से कम अब हाथ मेरा मेरे जाम तक पहुँचे।

आखरी खत…

वो उनका आखरी ख़त भी आज खो गया,
दूर तो होना ही था उन्हीं की तरह, सो गया।

डरता हूँ कि कहीं उनसे भूले से मुलाक़ात न हो,
क्या पता पहचाने ही न, सामने उनके जो गया।

नाम उनका आया जब महफ़िल में मेरी आज,
होंठ तो मुस्कुराए, दिल तो बस रो गया।

क्यों इल्ज़ाम आए मुझपर दिल लगाने का उनसे,
उनका होकर रह गया, रूबरू उनके जो गया।

रुस्वा मुझे किया कुछ इस सलीक़े से,
खुद तो वो गया, हर याद धो गया।

अब तो बस मिलना मुझसे शायरी में होता है,
बात पर होती नहीं, दूर इस कदर वो गया।

छुट्टी…

इक इक कर सामान कम होता चला गया,
पहले बहु, फिर बेटा चला गया।

अब फिर बस हम दो ही घर में अकेले बचे,
अगली बार लंबी छुट्टी आऊंगा, कहता चला गया।

अब फिर वही रूखी सी सुबह होगी,
गुम से बेमौसम बरसात की तरह होगी।

न हमें तेरा चेहरा देखने का मौका होगा,
न तेरे साथ बैठने का कोई तरीका होगा।

अब तुझसे बातें न होंगी अखबार की,
बुराई अब किससे करूँगा भ्रष्ट सरकार की।

नाश्ता न करने का इक बहाना मिल जाएगा,
दिन का खाना खाते हुए कौन सा चेहरा खिल जाएगा।

शाम की सब्ज़ी अब वैसी ज़ायकेदार न होगी,
रोटी की मांग एक के बाद दूसरी की बार बार न होगी।

अब तो ये बाग भी यूँ ही बेज़ार रहेगा,
अब इसे भी मेरी तरह तेरी अगली छुट्टी का इंतज़ार रहेगा।

छूने दे…

छूने दे किसी बहाने से,
या दूर कहीं ज़माने से,
किसी की नज़र में हम न आएं,
मेरी नियत पे कहीं किसी का शक न जाए।

जानता हूँ कि पसंद है तुझे,
तेज़ दौड़ना और हवाओं में उड़ना,
कुछ इत्मिनान रखना ख्वाइशों पे लेकिन,
तेरा यार कहीं आधे में थक न जाए।

दास्तान-ए-मुलाक़ात…

न हुआ उसका तो तू क्या तू हुआ,
कैसा तेरा इश्क़ जो उसके हाथों न बेआबरू हुआ।

किस्से मुक़म्मल तो कई होंगे पास तेरे,
बता कोई वाकिया जो उसके नाम से शुरू हुआ।

दिन का सुकून गया, रातों की तसल्ली गयी,
वाह रे, तेरा तो इश्क़ ही तेरा उदू हुआ।

कयामत हुई या सैलाब आया, या दर खुदा का खुला,
भला मंज़र कैसा था, जब तू उसके रूबरू हुआ।

लफ़्ज़ों को अपने न ज़ाया कर, सुन रहा हूँ,
तेरी आँखों से दास्ताँ, कि यूँ हुआ औऱ यूँ हुआ।

क्या बात है…

माना तू ख़फ़ा है मुझसे,
पर मेरी नज़्मों से नाराज़गी कैसी,
इन्होंने तो नहीं तोड़ा दिल तेरा,
फिर इन पर तेरी बेरुखी की बेचारगी कैसी।

इनमें ही मेरा इश्क़ बसता,
इनमें ही तेरा अक्स दिखता,
हाँ, हो सकता है दिखे होंगे कभी साथ मेरे,
पर होते हैं ये अक्सर पास तेरे।

इनसे तो तूने घंटों बातें की हैं,
इनके जरिए मुझसे जाने कितनी मुलाक़ातें की हैं,
इन्हीं के सजदों में कभी तेरे आँसू बहे थे,
इन्हीं की पनाहों में छिपे तेरे कहकहे थे।

इन्हीं में तेरे हर मिज़ाज को मैंने पिरोया है,
इन्हीं ने अकेले में तेरे ज़ख्मों को भी धोया है,
इन नज़्मों के ख़ुमार में कितनी ही शब ढली,
इन्ही की मखमली चादर में कितनी सहर खिली।

इनपे तेरा हक़, तेरा ही ज़ोर रहेगा,
तेरे होने से बोल उठता था हर लफ्ज़,
तेरे बिन शायर भी क्या और कहेगा,
इनका वजूद है तब ही तक,
जब तक तू साथ है,
वार्ना मरे हुए शेरों पे कौन कहता है,
“क्या बात है”।

ज़ायका सुर्ख रंग का…

गर चे वाक़िफ़ है हर दास्ताँ-ए-मोहब्बत से,
ऐ साक़ी, ज़ायका मुझे सुर्ख़ रंग का बता।

हँसाना, रुलाना या रुसवा कर जाना,
क्या है मोहब्बत, मुझे भी सिखा।

तेरी नज़र से नहीं परे इन दो जहाँ के सच,
जन्नत की हक़ीक़त, जहन्नुम की हूरें दिखा।

सुना है सिखाता है तू सभी को इश्क़ के गुर,
मुझको भी ज़रा ख़ुदगर्ज़ी के नुस्ख़े सिखा।

टूटते देखे हैं मैंने सितारे तेरी ठोकरों पे,
कुछ ऐसी ही मोहब्बत मुझसे भी जता।

बहुत जी लिए ख़ुश फ़हमियों से घिर कर,
अब कुछ दर्द मुझे दे, कुछ ख़ुद को सता।

कई होंगे यक़ीनन आस पास तेरे,
कुछ वक़्त ज़रा ख़ुद के साथ बिता।

मुलाक़ातें कर ले कुछ रक़ीबों से भी,
बज़्म में शामिल कर, दूरियाँ मिटा।

अलग बात है…

आँखें उनकी ढूंढती नहीं अब भीड़ में आँखें मेरी,
कभी सुकून-ए-दिल था दीद मेरा भी, अलग बात है।

अब और नहीं मुस्कुराते वो देख कर मुझे,
अक्सर पहले याद मेरी हँसा देती थी उन्हें, अलग बात है।

कहाँ आना होता है मेरी गली में उनका आजकल,
भूल जाने के बहाने ही मिल जाया करते थे पहले, अलग बात है।

नज़्में मेरी पढ़ पढ़ कर रातें गुज़रती थी उनकी,
अब रक़ीबों की महफिलों में मदहोश रहते हैं, अलग बात है।

छुप कर मुझे देखना तो दस्तूर सा था उनका,
सामने से गुजरते हुए भी मुँह फेर लेते हैं अब, अलग बात है।

वादा तो था ज़िन्दगी भर साथ निभाने का,
दो कदम चल कर भूल गए जो, अलग बात है।

चलते रहने दो…

न तुमसे बातें साफ कही जाएंगी,
न मुझसे हालात नुमाया होंगे,
इल्ज़ाम मैं ले लेता हूँ तुम्हारे भी,
बेकार ही लफ्ज़ तुम्हारे ज़ाया होंगे।

कौन सा तुम्हें कोई फर्क ही पड़ जाएगा,
खून हो या आँसू मेरे, बहने दो,
न बस में कुछ मेरे है ना तुम्हारे,
जैसा चल रहा है, चलते रहने दो।

उसका ख़याल…

उसके जिस्म को पा जाने की तमन्ना कभी न थी,
पर उसकी रूह को छू लेने का ज़रूर ख़याल रहा।

मेरे ज़ेहन में उसका अक्स जाने कब से है काबिज़,
क्या मैं भी हूँ उसकी आँखों में, ये सवाल रहा।

वो आएगी महफ़िल में यक़ीन था, देर से ही सही,
फिर भी उससे मिलने तलक ये दिल बेहाल रहा।

छू कर उसे जल गए उसके कई दीवाने-परवाने,
उसकी पनाह से दूर रह कर जीने का मुझको मलाल रहा।

दिन फिर गुज़र गया उसके दीद के इंतज़ार में,
खुद से अकेले में उसकी बातों का सिलसिला बहरहाल रहा।

उसने नज़र की थी मुझपर बस पल भर के लिए,
ता उम्र ख़ुशियों से मैं लेकिन मालामाल रहा।

दुनिया चल रही है…

साँसे थमी हैं, उनकी कमी खल रही है,
बाकी दुनिया जैसी थी, वैसी ही चल रही है।

सब ठीक है यूँ तो, पर ये क्या,
उन्होंने मुस्कुराया, धड़कन बहल रही है।

मैं अब भी वही हूँ, नियत का अपनी पक्का,
फिर क्यों उन्हें देख आज रूह पिघल रही है?

बहुत पी ली उनके नाम पर, अब बस भी कर यार,
लड़खड़ाती तेरी चाल अब बहुत सम्हल रही है।

इंतेज़ार अब बेसब्र हो चला है, बा-मुश्किल होगा,
देखो अब तो ये शमा भी रंग बदल रही है।

ऐसे कैसे ठंडी पड जाएगी आग उनके दिल की,
जब तलक उनकी लगाई आग यहाँ जल रही है।

थी उम्मीद, पर अब नहीं, उन्हें गले लगाने की,
जैसे दिन-ब-दिन उनसे मुलाकात की तारीख टल रही है।

बेहिसाब सितम उनके, और बेचैन जान हमारी,
उनकी शाम सुकून में भला कैसे ढल रही है।

गले से लगा कर समां लूँ खुद में उनको,
ऐसी भी तमन्ना अब इस दिल में पल रही है।

मैंने तो अपनी जान को जाते हुए देखा है,
क्या मुझे जाता देख उनकी जान भी हथेली से फिसल रही है?

तेरा इश्क़…

ये अल्फ़ाज़ों का सौदा मुस्कान के साथ,
वो अपनों सा सलीखा मेहमान के साथ,
मुझे अपने नज़दीक रखना गुमान के साथ,
ऐ साक़ी, तेरा इश्क़ समझना आसान नहीं।

कभी मेरी पनाहों में तेरा गुम हो जाना,
कभी तेरा मेरे मुझसे नज़दीक आना,
इक पल सब याद, अगले पल भूल जाना,
ऐ साक़ी, तेरा इश्क़ समझना आसान नहीं।

कभी चोट मुझपे मुसलसल तेरी,
कभी फिर बेहिसाब मोहब्बत तेरी,
कभी सिर्फ़ दीदार की इजाज़त तेरी,
ए साक़ी, तेरा इश्क़ समझना आसान नहीं।

कभी तेरी हर महफ़िल की जान मैं,
तेरा ज़मीन-ओ-आसमान मैं,
तेरा दीन धर्म ईमान मैं,
कभी अजनबी अनजान मैं,
ऐ साक़ी, तेरा इश्क़ समझना आसान नहीं।

तन्हाई का कभी तेरे इलाज हूँ,
कभी तेरी ज़िंदगी का साज़ हूँ,
कभी तो मेरा वजूद नहीं,
कभी तेरा हुस्न तेरा मिज़ाज हुँ,
ए साक़ी, तेरा इश्क़ समझना आसान नहीं।

तेरा इश्क़ मेरा फ़ितूर है,
तेरी रुसवाई भी मंज़ूर है,
तेरी मुस्कान मैं वजह नहीं,
तू नाराज़ मेरा क़ुसूर है,
ऐ साक़ी, तेरा इश्क़ समझना आसान नहीं।

सहर तुझसे, तेरी ही हर शाम,
तू ही बक्श देता है कभी ये जान,
तेरे ही दर पे सजदा सलाम,
तेरे ही लबों से ज़हर का जाम,
ऐ साक़ी, तेरा इश्क़ समझना आसान नहीं।

तू मेरी ज़िंदगी में…

तेरी सूरत अनजाने में ही सही,
पर आँखो में बसी है,
तुझसे दूरी मेरी साँसों में कमी है,
मेरी हर याद में तेरी ही छवि है,
तू मेरी ज़िंदगी में बस यूँ ही नहीं है।

तुझपे हक़ है मेरा,
मुझमें तू समाई है,
ना फिर जुदा हो सके,
खुदा ने ऐसी कुछ बनाई है,
तू नहीं आसपास जो,
आँखो में मेरे नमी है,
तू मेरी ज़िंदगी में बस यूँ ही नहीं है।

सुकून दिल को तेरे नाम से,
बेचैन जान मेरी फुरकत-ए-शाम से,
तेरी बातें फिर ख़ाली जाम से,
तुझसे मुलाक़ात बहाने या काम से,
इश्क़-ओ-जंग में सब सही है,
तू मेरी ज़िंदगी में बस यूँ ही नहीं है।

तू भी तो बातों के बीच रूकती होगी,
रास्तों में रुक कर मेरी राह तकती होगी,
तेरी भी राह मेरी गलियों में भटकती होगी,
मुझे देख तेरी भी चुन्नी सरकती होगी,
सच कह, मेरी सदा तूने सुनी है,
तू मेरी ज़िंदगी में बस यूँ ही नहीं है।

तू मेरी ज़िंदगी में…

तेरी सूरत अनजाने में ही सही,
पर आँखो में बसी है,
तुझसे दूरी मेरी साँसों में कमी है,
मेरी हर याद में तेरी ही छवि है,
तू मेरी ज़िंदगी में बस यूँ ही नहीं है।

तुझपे हक़ है मेरा,
मुझमें तू समाई है,
ना फिर जुदा हो सके,
खुदा ने ऐसी कुछ बनाई है,
तू नहीं आसपास जो,
आँखो में मेरे नमी है,
तू मेरी ज़िंदगी में बस यूँ ही नहीं है।

सुकून दिल को तेरे नाम से,
बेचैन जान मेरी फुरकत-ए-शाम से,
तेरी बातें फिर ख़ाली जाम से,
तुझसे मुलाक़ात बहाने या काम से,
इश्क़-ओ-जंग में सब सही है,
तू मेरी ज़िंदगी में बस यूँ ही नहीं है।

तू भी तो बातों के बीच रूकती होगी,
रास्तों में रुक कर मेरी राह तकती होगी,
तेरी भी राह मेरी गलियों में भटकती होगी,
मुझे देख तेरी भी चुन्नी सरकती होगी,
सच कह, मेरी सदा तूने सुनी है,
तू मेरी ज़िंदगी में बस यूँ ही नहीं है।

मिलने की तारीख…

उनके ज़हन को बेचैनी का ख्याल दे,
ऐ दिल, उनसे मिलने की तारीख एक दिन और टाल दे।

चलते रहने दे इशारों के ये सिलसिले यूँ ही,
कुछ और रातें उन्हें सौगात-ए-बेहाल दे।

आजकल मिलते भी हैं तो कुछ कहते नहीं,
मेरे रक़ीब को बोल, उन्हें कुछ सवाल दे।

तो क्या हुआ जो उनका यार है साथ उनके,
किसने मना किया कि वो खैरात-ए-जमाल दे|

वो यूँ ही मिल जाए हर रोज़ तो क्या ही मज़ा,
गुज़ारिश-ए-किस्मत, गैरमौजूदगी का उनकी मलाल दे|

उनसे आगे जी कर क्या ही करना है मुझे,
बस उनकी दीद होती रहे, इतने साल दे|

मेरा माहताब…

इक पल मुट्ठी में था सब कुछ,
अगले पल रेत सा फिसल गया,
था शामिल मुझमें यूँ तो,
न जाने कब वो निकल गया।

कल तक था जो हमराह मेरा,
रस्ता उसका भी बदल गया,
दिल ही तो था, कोई खुदा नहीं,
उसने बहलाया, बहल गया।

इल्ज़ाम उसपे भी आए क्यों,
कोई उसपे दोष लगाए क्यों,
जब रोना ही है अंजाम पर,
आगाज़ में कोई हँसाए क्यों।

पास है वो, कोई दूर नहीं,
इतना भी मैं मजबूर नहीं,
दीदार को उसके जी ये करे,
और न हो वो, मंज़ूर नहीं।

फिर वो लम्हा भी आएगा,
वो मेरे गले लग जाएगा,
भिगो के मेरे दामन को,
वो मन का बोझ घटाएगा।

बस उस दिन के इंतज़ार में हूँ,
जब मेरे ख्यालों का हिसाब होगा,
तू रखना, ऐ रब, अपना चाँद वहीं,
मेरे पास तो मेरा माहताब होगा।

गुनाहगार हूँ मैं…

माना तेरे हर ज़ख्म का गुनाहगार हूँ मैं,
पर इक आखरी अलविदा का हकदार हूँ मैं।

इक दर्द मिला था मुझे, वास्ते नमूने,
उसी मुकम्मल अफ़साने का तलबगार हूँ मैं।

तेरी महक अब भी मुझसे वैसी ही आती है,
गैरमौजूदगी में तेरी, तेरे इश्क़ का इश्तिहार हूँ मैं।

कल तेरी आँखों का नूर था मैं भी,
आज तेरी रुसवाई से बेज़ार हूँ मैं।

तुझे अपने दिल से निकाल देने का फैसला तो कर दिया,
अपने ही दिल के हाथों पर लाचार हूँ मैं।

जाम भी खत्म न हुआ, और नाम तेरा भूल गया,
किस बेसलीके का बादा-ख्वार हूँ मैं।

मेरी बातों पर मेरा कोई इख़्तेयार नहीं,
खुद ही के ज़हन से फरार हूँ मैं।

अब मुझसे न आशिक़ी होगी, न मौसिकी, न शायरी,
क्यों रहते हो पास मेरे, निहायती बेकार हूँ मैं।

चल उसे मनाने चले…

ऐ दिल, चल उसे मनाने चले,
जिसके बिना एक पल जैसे ज़माने चले।

दो दिन की नाराज़गी काफी है उससे,
जिसके साथ जाने कबसे तेरे फ़साने चले।

वो इश्क़ भला फिर क्या इश्क़ हुआ कि,
यार मुँह फेरे, अलग दीवाने चले।

बात कर, बात यकीनन बढ़ेगी,
तन्हाई में क्या बात, किसको बताने चले?

रूठा हुआ है दिल यहाँ खुद ही से खुद का,
ऐसे में फिर कौन किसे हँसाने चले।

भला दूर रहकर उससे तू रह पाएगा कभी,
कहाँ तू, कहाँ तेरे तराने चले।

छोड़ अब अपनी शायरी, ये सब किसके लिए,
जब वो ही नहीं पास तेरे,
किसके दामन में तू आँसू बहाने चले???

ढूंढता रहा…

ता उम्र फकत एक ख़्वाब ढूंढता रहा,
हमसफर, ऐ ज़िन्दगी, तुझसे खराब ढूंढता रहा।

जाने कितनी ही महजबीन आई मेरे सामने,
और मैं आसमां में माहताब ढूढ़ता रहा।

अनगिनत ही मिलते रहे जाम मुझको इश्क़ के,
और मैं बदनसीब मयखानों में शराब ढूंढता रहा।

हर कतरा उसकी दीद का समंदर से कम न था,
और मैं गैरों के हुस्न के तालाब ढूंढता रहा।

सूरतें तूने तो ज़िन्दगी साफ ही दिखलाई थी,
मैं जाने फिर क्यों सूरतों पे नकाब ढूंढता रहा।

मुझपे अपनी इनायत तूने तो बेहिसाब की थी,
पर मैं तेरे एहसानों का हिसाब ढूंढता रहा।

बुलाती रही तू मुझे बेखुद होकर आगोश में,
मैं ज़माने की धूप में ताब ढूंढता रहा।

ये फ़साना भी एक सच्चाई है मेरी,
ज़िंदा रह कर भी ज़िन्दगी जनाब ढूंढता रहा।

आहिस्ता चल…

ए दिल, इतनी भी क्या जल्दी पड़ी है, आहिस्ता चल,
उम्र काटने को सारी उम्र पड़ी है, आहिस्ता चल।

यूं तो इल्म है मुझे उसके इरादों का,
ज़िन्दगी खंजर लिए आगे खड़ी है, आहिस्ता चल।

सामने अनजाने, पीछे अध-सुलझे सवाल,
किधर जाऊँ, मुश्किल बड़ी है, आहिस्ता चल।

मेरे ख़यालों में उसका ज़िक्र और उसका मेरे ख़यालों पे सवाल,
दरमियाँ कुछ तो गड़बड़ी है, आहिस्ता चल।

वाकिफ हूँ मैं भी मंज़िल-ए-आदम से,
सुस्ता लूँ कुछ देर, थकान बड़ी है, आहिस्ता चल।

मोड़ पे सुना है मेरे इंतेज़ार में हैं कई,
यकीनन उनके पास इल्ज़ामों की लड़ी है, आहिस्ता चल।

बस अब और नहीं चाह साक़ी-ए-कौसर की,
उसके इश्क़ की खुमारी अब तक चढ़ी है, आहिस्ता चल।

वो इश्क़…

वो इश्क़ भी क्या जो भुलाने से भुला जाए,
वो यार ही क्या जो वादा करे और आ जाए।

मुहब्बत तो मुकम्मल है सिर्फ तभी,
जब रोज़ दिखे वो और रोज़ ही भा जाए।

फिर कौन खुमारी हो किसी शराब से,
इक बार जो अपने हाथों से वो पिला जाए।

क्या ख्वाइश रखे दो जहानों की,
गर कोई शख्स उसे पा जाए।

आदतन जो उसके सजदे करते थे,
कोई बताए, उसके बिना अब कैसे रहा जाए।

इश्क़ भी करें और इज़हार की मनाही,
ऐसे सितम को उसके किससे कहा जाए।

ऐसा भी वक़्त न दिखा ऐ संग-दिल,
न तू रो पाए, न मुझसे सहा जाए।

चल छोड़ ए दिल उसके आने की उम्मीद,
अपनी गर्द में ही चल फिर चला जाए।

अनजान कर देते हैं वो…

उसे रकीब के साथ देखने की आदत हो गयी,
ताज्जुब होता है जब मेरी बात कर देते हैं वो।

जानता हूँ मैं यूँ तो, कोई राब्ता नहीं अब,
फिर क्यों मेरा नाम आते ही आँखें भर लेते हैं वो।

बात निकले मेरी और खामोश रहे लब उनके,
कई बार ये नज़राना भी मगर देते हैं वो।

रातों में अक्सर हिचकियाँ आती हैं मुझे,
दबी आवाज़ में शायद मेरा नाम लेते हैं वो।

सदाएं मेरी चाहे न पहुँचे उन तक, जानता हूँ,
अक्सर लेकिन मुझे आवाज़ देते हैं वो।

मेरा नाम उनकी किताब के किसी पन्ने में ज़रूर होगा,
यूँ ही नहीं आशिक़ों को मेरी मिसाल देते हैं वो।

आएंगे किसी रोज़ रोते हुए मेरे ही दर पर,
जो आज मुझे जान कर अनजान कर देते हैं वो।

बातूनी आँखें…

बातूनी हैं तेरी आँखें,
कभी चुप रहती नहीं,
पर लबों से न जाने तू,
कभी कुछ कहती नहीं।

तेरे सुर्ख रुखसार,
तेरी हया बताते हैं,
झुकी पलकें तेरी,
तेरा इश्क़ जताते हैं।
फिर क्यों मेरी याद में,
तेरी आँखें बहती नहीं,
तेरे दिल में जो है,
तू कभी कुछ कहती नहीं।

मेरे जिस्म पर तेरे निशान,
तेरी दीवानगी दिखाते हैं,
मेरे ये लफ्ज़ अक्सर,
तुझे ही तो बुलाते हैं।
तेरा मुझसे नाराज़ होना,
मेरी धड़कनें सहती नहीं,
बातूनी हैं तेरी आँखें,
कभी चुप रहती नहीं।

ए वक़्त, रुक जा…

ऐ वक़्त, रुक ही जा तू यहाँ,
उसे जाने न दे जहाँ,
न पहुँचेगी मेरी बात कभी,
न आएगी उसे फिर याद कभी।

क्या पता फिर कभी मुलाक़ात न हो,
क्या पता फिर कभी ये रात न हो,
क्या पता उसके कोई नज़दीक आए,
कौन जाने फिर वो कभी वापिस न आए।

मेरी खामियाँ गर किसी की खासियत हो,
हँसा दे बस यूं ही, ऐसी शख्सियत हो,
मुझसे फिर मेरी मोहब्बत का भी हिसाब मांगा जाएगा,
क्या ही पता कि मुझसे बात करना भी टाला जाएगा।

वाकिफ हूँ, उसके हर पल में मैं शामिल नहीं,
तो क्या हुआ गर उसके बगैर मैं कामिल नहीं,
उसने तो साथ निभाने का कोई वादा नहीं किया,
मैं ही रहूँ काबिज़ दिल में, इरादा नहीं किया।

मैं नहीं मानता इश्क़ के इन पुराने रिवाज़ों को,
“जाने देना ही मोहब्बत है”, ऐसे ज़िक्र-ओ-किताबों को,
मुझे तो फकत उससे ही मतलब है,
साथ रहे हमेशा, बस यही ज़रूरत है।

मेरा दिल हमेशा उसके नाम पे खुदगर्ज़ रहेगा,
चाहे कुछ हो, बस यही एक चीज़ कहेगा,
कि ए वक़्त, होगा एहसान तेरा जो तू यहीं रुक जाएगा,
कल क्योंकि मुझे पता है, मेरा यार चला जाएगा।

तू अनजान सही…

मेरे हर्फ़, मेरा इश्क़ तेरा गुमान ही सही,

हक़दार हूँ तेरे ख़याल का, तेरा मेहमान ही सही।

ना हो मेरे नसीब में तेरी मौजूदगी, ना सही,

तेरे नाम की उम्र ना मिले, तेरे ज़िक्र की शाम ही सही।

तेरा ग़ुरूर तुझे मुबारक, मेरी आशिक़ी मुझे,

मुझे रुसवा करने की रीत, तेरी शान ही सही।

देखूँ मैं भी कब तक नज़रंदाजी का ये खेल रहेगा,

तेरी गलियों में मैं तुझसे अनजान ही सही।

छू ले तू लबों से, या बस नज़र कर दे,

ख़ुमार तो तब भी होगा, ख़ाली ये जाम ही सही।

खुदा है तू, तुझसे कैसा पर्दा,

सर आँखो पर तेरी चाहत, मेरी जान ही सही।

ख़ुशी के आँसू या ग़म की मुस्कान,

वाक़िफ़ हूँ तेरे हर एहसास से,

तुझसे चाहे मेरी फ़क़त पहचान ही सही।

वफ़ा निभा…

ए दिल किसी से तो वफ़ा निभा,

या तो मेरे साथ तन्हा रहना सीख

या उसी के साथ चला जा।

उसे लगता है सुकून मिला मुझे उससे दूर रहकर,

कभी तो उसे भी मेरी गली ला, मेरा हाल दिखा।

शिकायत रहती है उसे अक्सर कि कहता नहीं मैं,

कभी अकेले में उसे भी मेरी सदा सुना।

क्यूँ भला मैं इस क़दर अकेला ही तड़पूँ,

कभी तो उसको भी रातों में तड़पा।

वो भी चखे इस दर्द का ज़ायक़ा,

कभी उसे भी तो रात भर जगा।

हो ऐतबार किसी पे, रहे इंतज़ार किसी का,

हर पल बेचैनी का उसे ये रोग तो लगा।

नज़रन्दाज़ कर जाना आदत है उसकी,

जान कर अनजान बनने का कुछ हुनर मुझे भी सिखा।

चलो माना वो मुझसे अनजान-ओ-ग़ैर सही

बेख़ुदी का ये फ़ितूर फिर मेरे भी ज़ेहन से हटा।

ए दिल किसी से तो वफ़ा निभा।